काव्य-शिल्प • छंद शास्त्र • मात्रा विज्ञान

मात्रा गणना एवं
काव्य-शिल्प

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मात्रा संकेत एवं नियम निर्देशिका

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लघु वर्ण (1 मात्रा): अ, इ, उ, ऋ, चंद्रबिंदु (ँ) तथा बिना मात्रा वाले शुद्ध व्यंजन (क, ख, ग...)।
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गुरु वर्ण (2 मात्रा): आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अनुस्वार (ं), विसर्ग (ः) एवं संयुक्ताक्षर से पूर्व का वर्ण।
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संयुक्ताक्षर का प्रभाव: यदि किसी लघु वर्ण के ठीक बाद आधा अक्षर (जैसे 'क्त', 'प्र', 'त्य') आए, तो पूर्व लघु वर्ण गुरु (2) हो जाता है।
अध्याय 1 • छंद विज्ञान

मात्रा गणना के अचूक एवं प्रामाणिक नियम

छंद शास्त्र में किसी वर्ण (अक्षर) के उच्चारण में लगने वाले समय को 'मात्रा' कहते हैं। पलक झपकने के समय को एक मात्रा (लघु) माना जाता है, तथा उसके दुगने समय को दो मात्राएँ (गुरु) कहा जाता है।

नियम 1

ह्रस्व (लघु) वर्ण — मान = 1 मात्रा (।)

निम्नलिखित वर्णों की 1 मात्रा मानी जाती है:

  • मूल स्वर: अ, इ, उ, ऋ
  • ह्रस्व स्वर युक्त व्यंजन: क, कि, कु, कृ इत्यादि।
  • अनुनासिक (चंद्रबिंदु) युक्त वर्ण: हँस, चाँदनी का 'चाँ' (दीर्घ होने पर गुरु, लेकिन 'हँ' लघु)। चंद्रबिंदु अपने वर्ण का भार नहीं बढ़ाता।
नियम 2

दीर्घ (गुरु) वर्ण — मान = 2 मात्राएँ (ऽ)

निम्नलिखित वर्णों की 2 मात्राएँ गिनी जाती हैं:

  • दीर्घ स्वर: आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ
  • दीर्घ मात्रा वाले व्यंजन: का, की, कू, के, कै, को, कौ
  • अनुस्वार (बिंदी) युक्त वर्ण: कंग, संत, चंदन ('सं' = 2, 'चन्' = 2)
  • विसर्ग युक्त वर्ण: अतः, दुःख ('अतः' में 'तः' = 2 मात्राएँ)
महत्वपूर्ण नियम 3

संयुक्ताक्षर (आधे अक्षर) से पूर्व का वर्ण

यदि किसी लघु वर्ण के बाद कोई आधा अक्षर (संयुक्त व्यंजन) आता है, तो उच्चारण का आघात (Stress) पड़ने के कारण वह लघु वर्ण गुरु (2) बन जाता है:

सत्य: 'स' (1) + आधा 'त्' मिलकर 'स' = 2 (ऽ), और 'य' = 1 (।) → कुल = 3 मात्राएँ (ऽ ।)

भक्त: 'भ' (1) + आधा 'क्' मिलकर 'भ' = 2 (ऽ), और 'त' = 1 (।) → कुल = 3 मात्राएँ (ऽ ।)

धर्म: 'ध' + 'र्' = 2 (ऽ), 'म' = 1 (।) → कुल = 3 मात्राएँ (ऽ ।)

नियम 4

शब्द के आरंभ में आने वाला आधा अक्षर

यदि आधा अक्षर शब्द के प्रारंभ में हो, तो उसका कोई मात्रा भार नहीं होता:

प्यार: आधा 'प्' (0) + 'या' (2) + 'र' (1) = 3 मात्राएँ (ऽ ।)

प्रेम: 'प्रे' (2) + 'म' (1) = 3 मात्राएँ (ऽ ।)

स्थान: आधा 'स्' (0) + 'था' (2) + 'न' (1) = 3 मात्राएँ (ऽ ।)

अध्याय 2 • मात्रिक छंद

दोहा शिल्प, विधान एवं संरचना

दोहा हिंदी साहित्य का सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रतिष्ठित अर्धसम मात्रिक छंद है। इसमें दो पंक्तियाँ (चार चरण) होती हैं।

प्रथम चरण (विषम) 13 मात्राएँ
+
द्वितीय चरण (सम) 11 मात्राएँ
=
एक पंक्ति (दल) 24 मात्राएँ

1. चरणों का विभाजन:

पहले और तीसरे चरण (विषम चरण) में 13-13 मात्राएँ होती हैं। दूसरे और चौथे चरण (सम चरण) में 11-11 मात्राएँ होती हैं।

2. पादांत (चरण का अंत) नियम:

दूसरे और चौथे चरण (सम चरण) के अंत में अनिवार्य रूप से गुरु-लघु (ऽ ।) अर्थात् 2-1 मात्रा आनी चाहिए। कभी भी अंत में दो गुरु (ऽ ऽ) या दो लघु (। ।) नहीं होने चाहिए।

3. विषम चरण का प्रारंभ:

13 मात्राओं वाले विषम चरण के प्रारंभ में कभी भी जगण (। ऽ ।) नहीं आना चाहिए। उदाहरणार्थ 'कहे कबीर' (। ऽ । ऽ) से दोहे का प्रारंभ दोषपूर्ण माना जाता है।

आदर्श दोहा उदाहरण (कविवर बिहारी):

कनकु कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाइ। (13 + 11 = 24 मात्राएँ)

इहि खाये बौराइ जग, उहि पाये बौराइ॥ (13 + 11 = 24 मात्राएँ)

अध्याय 3 • ग़ज़ल शिल्प

ग़ज़ल का शिल्प, अरूज़ एवं बहर

ग़ज़ल केवल शेरों का संग्रह नहीं, बल्कि एक अनुशासित छंदबद्ध कला है जिसमें प्रत्येक शेर अपने आप में एक संपूर्ण विचार समेटे होता है।

1. मतला (Matla)

ग़ज़ल का पहला शेर जिसके दोनों मिसरों (पंक्तियों) में काफ़िया और रदीफ़ का पूर्ण निर्वाह होता है।

2. रदीफ़ (Radeef)

शेर के अंत में आने वाले हूबहू दोहराए जाने वाले शब्द (जैसे "चाहिए", "होता है")।

3. काफ़िया (Qafia)

रदीफ़ से ठीक पहले आने वाले हम-आवाज़ (Rhyming) शब्द (जैसे "पिघलनी / निकलनी", "पानी / कहानी")।

4. मक़्ता (Maqta)

ग़ज़ल का अंतिम शेर, जिसमें शायर अपना उपनाम (तख़ल्लुस) दर्ज करता है।

5. बहर व वज़्न (Bahr & Wazan)

ग़ज़ल का वह निश्चित मीटर / लय जिसके आधार पर सभी मिसरे बराबर तौले जाते हैं (लघु-गुरु का निश्चित क्रम)।

अध्याय 4 • मात्रिक छंद

चौपाई, सोरठा एवं अन्य मात्रिक छंद

चौपाई विधान

चौपाई (16 मात्राएँ प्रति चरण)

चौपाई एक सम मात्रिक छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती हैं। चरण के अंत में जगण (। ऽ ।) अथवा तगण (ऽ ऽ ।) का आना वर्जित है। अंत में सामान्यतः दो गुरु (ऽ ऽ) आते हैं।

उदाहरण (श्रीरामचरितमानस):
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। (16 मात्राएँ)
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥ (16 मात्राएँ)

सोरठा विधान

सोरठा (दोहा का उल्टा छंद)

सोरठा, दोहे का ठीक उल्टा होता है। इसके पहले और तीसरे (विषम) चरण में 11-11 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे (सम) चरण में 13-13 मात्राएँ होती हैं। तुक विषम चरणों में मिलती है।

अध्याय 5 • काव्य सौंदर्य

अलंकार एवं नवरस विवेचन

अनुप्रास अलंकार

जहाँ वर्णों की आवृत्ति बार-बार हो। (उदा. चारु चंद्र की चंचल किरणें)

यमक अलंकार

एक ही शब्द कई बार आए और हर बार अर्थ भिन्न हो। (उदा. कनक कनक ते सौ गुनी)

श्लेष अलंकार

एक ही शब्द के प्रसंगवश अनेक अर्थ निकलते हों। (उदा. रहिमन पानी राखिये...)

उपमा व रूपक

जहाँ किसी वस्तु की तुलना प्रसिद्ध वस्तु से की जाए या अभेद आरोप हो। (उदा. मुख मयंक सम मंजु मनोहर)